Nike ZoomX क्या है? स्पीड का राज

2015 से 2024: कुशनिंग टेक्नोलॉजी का बदलता दौर

याद है जब मैराथन रनिंग में सिर्फ यह देखा जाता था कि जूता कितना हल्का है? 2015 में जब मैंने दिल्ली-एनसीआर की सड़कों पर दौड़ना शुरू किया था, तब कुशनिंग का मतलब था EVA फोम के भारी-भरकम ब्लॉक। एक आम धारणा थी कि ज्यादा कुशनिंग का मतलब है ज्यादा वजन, और ज्यादा वजन यानी धीमी गति। उस समय कोई सोच भी नहीं सकता था कि कुशनिंग वास्तव में आपको तेज दौड़ा सकती है। 2017 के 'ब्रेकिंग2' (Breaking2) प्रोजेक्ट ने इस पूरी धारणा को पलट दिया। नाइकी ने एक ऐसी तकनीक पेश की जिसने जूतों के डिजाइन का पूरा व्याकरण ही बदल दिया। 9 साल के अपने रनिंग करियर में मैंने कई तरह के जूते आज़माए हैं, लेकिन जिस तरह से इस तकनीक ने धावकों की रिकवरी और रेस के नतीजों को प्रभावित किया है, वह हैरान करने वाला है। एयरोस्पेस इनोवेशन से प्रेरित यह nikezoomx तकनीक वास्तव में क्या है और यह कैसे काम करती है, यह समझना हर सीरियस रनर के लिए जरूरी है।
मैराथन रनर अपने नाइकी जूते के फीते बांधते हुए
मैराथन रनर अपने नाइकी जूते के फीते बांधते हुए

फोम के पीछे का विज्ञान: Pebax और एनर्जी रिटर्न

यह कोई रहस्य नहीं है कि आधुनिक सुपर शूज की सफलता का मुख्य कारण उनके भीतर इस्तेमाल होने वाला मटीरियल है। पारंपरिक रनिंग जूतों में आमतौर पर EVA या TPU (जैसे एडिडास बूस्ट) का उपयोग होता है। इसके विपरीत, नाइकी की यह तकनीक Pebax (polyether block amide) नामक एक उच्च-प्रदर्शन वाले प्लास्टिक पर आधारित है। RunRepeat की लैब टेस्टिंग और शूज एनालिसिस के अनुसार, Pebax फोम न केवल पारंपरिक फोम से काफी हल्का होता है, बल्कि इसका एनर्जी रिटर्न रेट भी अभूतपूर्व है। जब धावक दौड़ता है, तो पैर जमीन पर टकराते ही कुछ ऊर्जा फोम को दबाने में खर्च हो जाती है। EVA फोम इस ऊर्जा का लगभग 60-65% हिस्सा ही वापस कर पाता है। लेकिन PubMed Central (NIH) में प्रकाशित एक वैज्ञानिक स्टडी स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि कार्बन प्लेट और हाई-कुशनिंग वाले जूते रनिंग इकॉनमी में लगभग 4% का सुधार करते हैं। कंपनी का दावा है कि उनका Pebax ब्लेंड 85% तक एनर्जी रिटर्न देता है, जिसका सीधा असर धावक की स्पीड और थकान पर पड़ता है। यहाँ विभिन्न फोम मटीरियल्स की एक विशुद्ध डेटा-आधारित तुलना दी गई है:
फोम का प्रकार औसत एनर्जी रिटर्न वजन ड्यूरेबिलिटी (उम्र) विशेषता
EVA (पारंपरिक) 60-65% मध्यम 400-500 किमी सख्त, स्टेबल आधार
TPU (Boost आदि) 70-75% भारी 600-800 किमी बेहतरीन ड्यूरेबिलिटी
Pebax ब्लेंड 80-85% बहुत हल्का 250-350 किमी अत्यधिक बाउंसी
Source: Compiled from industry lab tests and independent sports science data. Last verified: 2024-03-05 डेटा से एक बात साफ है कि इस फोम की लाइफलाइन बहुत कम होती है। 250 से 300 किलोमीटर के बाद इसके अंदर का बाउंस कम होने लगता है, जिससे यह रोजमर्रा की ट्रेनिंग के लिए आर्थिक रूप से एक व्यवहारिक विकल्प नहीं रह जाता।

30 किलोमीटर के बाद शरीर पर असर

कई एमेच्योर धावक अक्सर पूछते हैं कि क्या सुपर शूज पहनने से वे रातों-रात फास्ट हो जाएंगे। एक सर्टिफाइड कोच के तौर पर मेरा हमेशा यही जवाब होता है कि यह फोम आपके पैरों के लिए कोई जादुई स्प्रिंग नहीं है। इसका मुख्य काम आपकी मांसपेशियों की थकान (fatigue) को कम करना है। हैल हिगडन (Hal Higdon) की मैराथन ट्रेनिंग फिलॉसफी भी इसी बात पर जोर देती है कि सही गियर का चुनाव आपके ट्रेनिंग ब्लॉक और रेस डे की रणनीति के अनुकूल होना चाहिए। 36 की उम्र में, जब मैं 30 किलोमीटर की लॉन्ग रन के बाद आखिरी 5-7 किलोमीटर दौड़ रहा होता हूँ, तब मुझे zoomx की असली अहमियत समझ आती है। हाल ही में एक रेस के दौरान मैंने महसूस किया कि मेरे क्वाड्स (quads) और काव्स (calves) उतनी बुरी तरह से डैमेज नहीं हुए जितने साधारण जूतों में होते थे। रेस के तीसरे दिन ही मैं एक लाइट जॉग करने की स्थिति में था। हालाँकि, इस अत्यधिक सॉफ्टनेस की एक कीमत भी चुकानी पड़ती है। टखने (ankle) की स्टेबिलिटी एक बहुत बड़ा मुद्दा बन जाती है। अगर आपका रनिंग फॉर्म सही नहीं है या आप बहुत ज्यादा ओवर-प्रोनेट (overpronate) करते हैं, तो यह फोम आपको चोटिल भी कर सकता है।
ध्यान दें: अपने रेस डे वाले सुपर शूज को रोजाना की आसान रिकवरी रन में इस्तेमाल करने से बचें। स्टेबल जूतों को डेली ट्रेनिंग के लिए रखें और इन महंगे विकल्पों को सिर्फ स्पीड वर्कआउट या रेस डे के लिए बचाएं।
सुबह के समय मैराथन दौड़ते हुए भारतीय धावक
सुबह के समय मैराथन दौड़ते हुए भारतीय धावक

भारत में मैराथन रेसिंग के नियम और स्टैक हाइट

रेस के दिन जूतों के चुनाव को लेकर अब नियम अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर काफी सख्त हो चुके हैं। केवल तकनीक का होना ही काफी नहीं है, बल्कि उस तकनीक का रेसिंग मानकों के अनुरूप होना भी अनिवार्य है। भारत में आयोजित होने वाली किसी भी प्रतिष्ठित मैराथन में अगर कोई एथलीट पोडियम या प्राइज मनी के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहा है, तो उसके जूतों को Athletics Federation of India (AFI) के सड़क दौड़ दिशानिर्देशों का सख्ती से पालन करना होता है। इन नियमों के अनुसार, रोड रेस के लिए जूतों के सोल की अधिकतम मोटाई (Stack Height) 40mm से अधिक नहीं हो सकती। यही कारण है कि स्पोर्ट्स ब्रांड्स अपने सुपर शूज को 40mm की सीमा के ठीक अंदर (जैसे 39.5mm) डिजाइन करते हैं। इसके अलावा, World Athletics की टेक्निकल कंप्लायंस लिस्ट में स्पष्ट रूप से उन जूतों का विवरण होता है जो आधिकारिक रेस के लिए मान्य हैं। अगर कोई धावक 50mm स्टैक हाइट वाले गैर-मान्यता प्राप्त जूते पहनकर अपनी केटेगरी जीत भी जाता है, तो पोस्ट-रेस चेकिंग के दौरान उसे तुरंत डिस्क्वालिफाई कर दिया जाता है। नियमों की अनदेखी किसी भी एलीट या एज-कैटेगरी रनर की महीनों की मेहनत पर पानी फेर सकती है।

क्या आपको इस महंगे गियर में निवेश करना चाहिए?

अगर आप दौड़ने की दुनिया में नए हैं, तो मेरा सीधा जवाब होगा—नहीं। रनिंग फॉर्म, स्ट्रेंथ ट्रेनिंग, और सही न्यूट्रिशन आपको किसी भी महंगे गियर से ज्यादा फायदा देंगे। पहाड़ों में ट्रेकिंग करते हुए मैंने एक बहुत ही महत्वपूर्ण सबक सीखा है: अगर आपका बेस मजबूत नहीं है, तो सबसे महंगे उपकरण भी आपको मुश्किल रास्तों पर बचा नहीं सकते। लेकिन, अगर आप एक एडवांस्ड रनर हैं, आपका लक्ष्य सब-4 (Sub-4) या सब-3:30 मैराथन है, और आप उस आखिरी 1-2% मार्जिन की तलाश में हैं, तो यह फोम टेक्नोलॉजी आपके लिए एक बेहतरीन निवेश हो सकती है। यह बिल्कुल उस पुरानी क्लासिक हिंदी फिल्म की तरह है जिसे आप बार-बार देख सकते हैं; आप जानते हैं कि कहानी का अंत क्या होगा, लेकिन हर बार आपको वही थ्रिल और रोमांच महसूस होता है। सही तकनीक आपके पैरों को पंख नहीं देती, लेकिन यह आपकी दौड़ने की क्षमता को एक अलग स्तर पर जरूर ले जाती है। 🏃‍♂️👟
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Raftaar_Rahul

पिछले 9 वर्षों से मैराथन रनिंग के प्रति समर्पित। राहुल एक प्रमाणित रनिंग कोच हैं जिन्होंने दिल्ली, मुंबई और बैंगलोर की प्रमुख मैराथन में हिस्सा लिया है और अब हिंदी भाषी धावकों को प्रशिक्षित कर रहे हैं

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