मैराथन के बाद की उदासी (Post-Marathon Blues) एक सच्चाई है

रेस के बाद का खालीपन: एक कड़वी सच्चाई

मैराथन खत्म हो गई है। वह चमचमाता हुआ मेडल दीवार पर टंग चुका है। इंस्टाग्राम पर तस्वीरें पोस्ट हो गईं और बधाइयों के मैसेज भी अब थम गए हैं। लेकिन अंदर से कैसा लग रहा है? खालीपन? थकान? एक अजीब सी उदासी? यह कोई बीमारी नहीं है, बल्कि एक ऐसा सच है जिससे हर धावक गुज़रता है।

कुछ साल पहले तक, मैं खुद एक बेवकूफी भरी सलाह दिया करता था कि रेस के अगले ही दिन हल्की रिकवरी रन (Recovery Run) करो ताकि पैरों की जकड़न कम हो। आज मैं इसे सरासर बकवास मानता हूँ। रेस के बाद शरीर से ज्यादा आपका दिमाग थका होता है, और उसे आराम की सख्त जरूरत होती है। मेरी स्पष्ट सलाह है: अपना marathon training plan तुरंत रोक दें। अगले कुछ हफ्तों के लिए आपका कोई नया शेड्यूल नहीं होना चाहिए। अपनी स्मार्टवॉच का अलार्म बंद करें। जब तक आप इस उदासी (Post-Marathon Blues) को स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक आप इससे बाहर नहीं आ पाएंगे। भागने की जल्दी मत कीजिए, रुकना सीखिए।

फोरम और कम्युनिटी की हकीकत

ऑनलाइन फोरम और फेसबुक के रनिंग ग्रुप्स में हर बड़े इवेंट के बाद एक ही तरह के पोस्ट की बाढ़ आ जाती है। टाटा मुंबई मैराथन हो या दिल्ली हाफ मैराथन, धावकों की एक ही शिकायत होती है—"महीनों की मेहनत के बाद अब सुबह 4 बजे उठकर क्या करूं?"

हाल ही में एक धावक ने अपना पर्सनल बेस्ट (PB) तोड़ा। रेस के दिन वह सातवें आसमान पर था, लेकिन ठीक तीन दिन बाद उसने फोरम पर लिखा कि उसे बिस्तर से उठने का मन नहीं कर रहा है। कम्युनिटी में यह एक बेहद आम घटना है। महीनों तक हमारी डाइट, स्लीप साइकिल और वीकेंड के लॉन्ग रन के इर्द-गिर्द पूरी ज़िंदगी सेट रहती है। और फिर, एक रविवार की सुबह वह सब कुछ 4 या 5 घंटे में खत्म हो जाता है। अचानक से वह रूटीन अनाथ हो जाता है।

Two runners embrace in a heartfelt
Two runners embrace in a heartfelt

लक्ष्य का अंत और मेंटल बर्नआउट

यह पूरी समस्या मुख्य रूप से एक 'लक्ष्य' के अचानक खत्म हो जाने से जुड़ी है। शरीर तो आराम कर रहा होता है, लेकिन दिमाग उस तनाव और रूटीन को मिस करता है जिसकी उसे लत लग चुकी थी। जब आप किसी मैराथन के लिए ट्रेनिंग करते हैं, तो आपका दिमाग लगातार एक उच्च तनाव वाले 'फाइट और फ्लाइट' मोड में होता है। रेस खत्म होने के बाद उस फोकस की कोई जगह नहीं बचती।

ऐसे में Hal Higdon की रिकवरी थ्योरी बहुत काम आती है, जो न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक रिकवरी पर भी गहराई से ज़ोर देती है।

Tip: रेस के बाद के पहले दो हफ्ते किसी भी तरह के स्ट्रक्चर्ड वर्कआउट से बचें। क्रॉस-ट्रेनिंग करें, जैसे स्विमिंग या साइक्लिंग, लेकिन उसमें भी कोई 'पेस' या 'हार्ट रेट' का टारगेट न रखें।
  1. हफ्ता 1: पूरी तरह से आराम। बस थोड़ी बहुत स्ट्रेचिंग, योगा और पैदल चलना। शरीर को हील होने दें।
  2. हफ्ता 2: हल्की एक्टिविटी। बिना किसी पेस (Pace) या दूरी के लक्ष्य के साइक्लिंग या स्विमिंग।
  3. हफ्ता 3: अगर आपका मन करे, तो छोटी और आसान रनिंग शुरू करें। अगर मन न करे, तो ब्रेक को बेझिझक और बढ़ा दें।

विज्ञान और आंकड़े क्या कहते हैं

यह उदासी सिर्फ एक मनोवैज्ञानिक वहम नहीं है, बल्कि एक साबित बायोकेमिकल सच्चाई है। PubMed Central पर मौजूद स्पोर्ट्स साइंस रिसर्च स्पष्ट रूप से दिखाती है कि एंड्योरेंस एथलीटों में बड़े इवेंट के बाद एंडोर्फिन (Endorphins) और डोपामाइन (Dopamine) जैसे 'फील-गुड' हार्मोन्स का स्तर अचानक से गिर जाता है। यह गिरावट बिल्कुल वैसी ही होती है जैसे किसी कैफीन की लत के अचानक छूटने पर शरीर प्रतिक्रिया देता है।

दुनिया भर में हर साल लाखों लोग मैराथन दौड़ते हैं। 2025 के शुरुआती डेटा को आधार मानें तो, RunRepeat के अनुसार वैश्विक मैराथन भागीदारी में पिछले एक दशक में भारी वृद्धि हुई है। जैसे-जैसे धावकों की संख्या बढ़ी है, वैसे-वैसे रेस के बाद मानसिक थकान की रिपोर्टिंग भी बढ़ी है।

फिनिशर्स की श्रेणी अनुमानित प्रतिशत जिन्हें 'ब्लूज' महसूस होता है रिकवरी का औसत समय
पहली बार मैराथन करने वाले 65% - 70% 3 से 4 हफ्ते
रेगुलर / एमेच्योर धावक 40% - 50% 1 से 2 हफ्ते
एडवांस्ड / एलीट एथलीट 20% - 30% कुछ दिन
Source: ग्लोबल रनिंग कम्युनिटी सर्वे 2025. Last verified: 2026-05-26
A clear glass bowl holds vibrant
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हम इंसान हैं, मशीनें नहीं

दिल्ली के लोधी गार्डन में सुबह-सुबह जब मैं युवा धावकों को खुद को मशीनों की तरह दौड़ाते देखता हूँ, तो एक अजीब सी हताशा होती है। हम इंसान हैं, कोई गार्मिन की मशीनें नहीं! हमें हर समय पीक परफॉर्मेंस देने की कोई ज़रूरत नहीं है। हमारी कीमत हमारे Strava के डेटा या लीडरबोर्ड से तय नहीं होती।

यह अहसास बहुत ज़रूरी है। World Athletics ने भी एथलेटिक्स में मानसिक स्वास्थ्य के महत्व को स्वीकार किया है और स्पष्ट किया है कि बड़े इवेंट्स के बाद का इमोशनल ड्रॉप पूरी तरह से प्राकृतिक है।

2015 से लेकर अब तक, इन 11 वर्षों के अनुभव में मैंने कई जूते घिसे हैं और कई बार खुद को चोटिल किया है। शुरुआती सालों में मुझे लगता था कि रुकना हार मानना है। मैं लगातार बिना ब्रेक के रेस दौड़ता था। लेकिन अब मैं समझ गया हूँ कि मैराथन केवल शारीरिक नहीं, बल्कि एक गहरी मानसिक यात्रा है। अपना मौजूदा marathon training plan पूरा करने के बाद खुद को ब्रेक दें।

अगर रेस के बाद उदासी आए तो उसे गले लगाइए। पहाड़ों में ट्रेकिंग पर निकल जाइए, सोफे पर बैठकर अपनी पसंदीदा पुरानी हिंदी फिल्में देखिए और अपने शरीर व दिमाग को वह सम्मान दीजिए जिसका वह हकदार है। रनिंग कहीं नहीं जा रही है, वह हमेशा आपका इंतज़ार करेगी।

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Raftaar_Rahul

पिछले 9 वर्षों से मैराथन रनिंग के प्रति समर्पित। राहुल एक प्रमाणित रनिंग कोच हैं जिन्होंने दिल्ली, मुंबई और बैंगलोर की प्रमुख मैराथन में हिस्सा लिया है और अब हिंदी भाषी धावकों को प्रशिक्षित कर रहे हैं

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