लोग दौड़ते क्यों हैं? एक अनुभवी धावक का नज़रिया और कुछ कड़वे सच
दिल्ली-एनसीआर की सड़कों पर जब उमस भरी गर्मी में सुबह के 5 बजे मैं अपने जूतों के फीते बांध रहा होता हूं, तो अक्सर सड़क किनारे खड़े लोग मुझे बड़ी अजीब नज़रों से देखते हैं। उनकी आंखों में एक ही सवाल होता है—"भाई, आखिर क्यों? क्या आफत आ गई है जो इतनी सुबह खुद को सजा दे रहे हो?" सच कहूं तो, 2015 में जब मैंने पहली बार मैराथन की दुनिया में कदम रखा था, तो मेरे मन में भी यही सवाल था। 5 साल के इस सफर ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है, लेकिन आज भी जब मैं किसी नए धावक को हांफते हुए देखता हूं, तो पुराने दिन याद आ जाते हैं।

क्या यह सिर्फ एक 'दिखावा' है या कुछ और?
आजकल इंस्टाग्राम पर मैराथन फिनिशर मेडल के साथ फोटो डालना एक ट्रेंड बन गया है। लोग पूछते हैं कि क्या लोग सिर्फ 'स्वैग' के लिए दौड़ रहे हैं? अगर मैं अपने अनुभव और रनिंग कम्युनिटी की चर्चाओं को देखूं, तो शुरुआत अक्सर दिखावे या वजन कम करने के दबाव से ही होती है। लेकिन जो धावक टिक जाता है, उसके लिए यह मेडल से कहीं बढ़कर हो जाता है।
मुझे याद है जब मैंने शुरुआत की थी, तब मुझे लगता था कि दौड़ना सिर्फ पैरों का काम है। लेकिन Runner's World की एक रिपोर्ट बिल्कुल सही कहती है कि लोग मानसिक स्पष्टता के लिए दौड़ते हैं। जब आप सड़क पर होते हैं, तो न कोई बॉस होता है, न कोई स्प्रेडशीट और न ही फोन की नोटिफिकेशन। वहां सिर्फ आप और आपकी सांसें होती हैं। यह एक तरह का 'एक्टिव मेडिटेशन' है जिसे लोग बाहर से नहीं समझ सकते।
जिम की चारदीवारी बनाम खुली सड़क: मेरा डेटा एनालिसिस
एक एडवांस्ड रनर होने के नाते, मुझे डेटा और नंबरों से खेलना पसंद है। अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं कि जिम जाना बेहतर है या मैराथन की तैयारी करना? मैंने पिछले 5 सालों में जो महसूस किया है, उसे इस तरह समझा जा सकता है:
| तुलना | जिम लाइफ | मैराथन ट्रेनिंग |
|---|---|---|
| लक्ष्य | मसल्स और बॉडी शेप | सहनशक्ति और मानसिक मज़बूती |
| माहौल | एसी, म्यूजिक और शीशे | धूप, धूल, बारिश और बदलता मौसम |
| अनुशासन | 1 घंटे का वर्कआउट | महीनों का एक सख्त marathon training plan |
| सोशल लाइफ | सेट के बीच गपशप | रनिंग कम्युनिटी के साथ लंबी दूरी का सफर |
जिम आपको फिट बना सकता है, लेकिन मैराथन ट्रेनिंग आपको अनुशासन सिखाती है। World Athletics के शोध बताते हैं कि लंबी दूरी की दौड़ से हृदय प्रणाली (cardiovascular system) में जो सुधार होता है, वह किसी भी इनडोर एक्सरसाइज से कहीं अधिक टिकाऊ होता है।
एक कोच की नज़र से: मैराथन की असलियत
एक सर्टिफाइड कोच के तौर पर मैं जब किसी को marathon training plan बनाकर देता हूं, तो मैं उन्हें पहले ही चेतावनी दे देता हूं कि यह आसान नहीं होने वाला। यह सिर्फ दौड़ने का खेल नहीं है; यह आपके पूरे जीवन को व्यवस्थित करने का खेल है।
शुरुआती 4 हफ्ते (हनीमून फेज): नए जूते, नया उत्साह। आप जोश में दौड़ते हैं और फिर तीसरे दिन बिस्तर से उठ नहीं पाते। पिंडलियों का दर्द आपको बताता है कि आपने अपनी सीमाओं को चुनौती दी है।
मध्य चरण (संघर्ष): यहां असल परीक्षा होती है। जब आपको संडे की सुबह 18 किलोमीटर दौड़ना होता है और आपके दोस्त पुरानी हिंदी फिल्मों का मैराथन देख रहे होते हैं। Hal Higdon का Novice 1 प्लान भी यही सिखाता है कि धीरे-धीरे अपनी क्षमता को बढ़ाना ही असली जीत है।
टैपरिंग और रेस डे: रेस से दो हफ्ते पहले जब हम दौड़ना कम कर देते हैं, तो दिमाग अजीब तरह से व्यवहार करने लगता है। इसे हम धावक 'टैपर क्रेजीनेस' कहते हैं। लेकिन जब आप उस फिनिश लाइन को पार करते हैं, तो वह 42.195 किलोमीटर का दर्द एक सेकंड में गायब हो जाता है।

विज्ञान और भारत में बदलता माहौल
क्या आपने कभी 'रनर हाई' (Runner's High) के बारे में सुना है? यह कोई काल्पनिक बात नहीं है। PubMed Central का डेटा यह स्पष्ट करता है कि एरोबिक एक्सरसाइज हमारे दिमाग में एंडोर्फिन और डोपामाइन का संचार करती है, जो सीधे तौर पर तनाव को कम करता है।
भारत में भी यह बदलाव साफ दिख रहा है। Athletics Federation of India (AFI) की कोशिशों और बड़े शहरों में होने वाली मैराथन्स ने इसे एक जन आंदोलन बना दिया है। RunRepeat के आंकड़ों (अगस्त 2020 तक) के अनुसार, भारत में रिक्रिएशनल रनिंग की ग्रोथ रेट दुनिया के कई विकसित देशों से कहीं ज्यादा है।
निष्कर्ष: दौड़ आखिर क्यों?
तो, हम क्यों दौड़ते हैं? क्या यह घुटनों को घिसने की सनक है? शायद नहीं। 5 साल के अनुभव के बाद मैं कह सकता हूं कि हम इसलिए दौड़ते हैं क्योंकि दौड़ना हमें यह याद दिलाता है कि हम अभी जीवित हैं। दिल्ली की प्रदूषित हवा और कंक्रीट के जंगलों के बीच, वह एक घंटा जब मैं सड़क पर होता हूं, वही मेरा असली 'मी-टाइम' होता है।
दौड़ना आपको विनम्र बनाता है। यह आपको सिखाता है कि हर किलोमीटर के लिए आपको मेहनत करनी पड़ती है, कोई शॉर्टकट नहीं है। चाहे आप 5 किमी दौड़ें या 42 किमी, फर्क सिर्फ आपकी हिम्मत का है। अगर आपने अभी तक शुरुआत नहीं की है, तो एक बार जूतों के फीते बांधकर देखिए—शायद वह 'रनर हाई' आपका इंतज़ार कर रहा हो!
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