क्या मैराथन की राह हमेशा सुहानी होती है? असली सच
इंस्टाग्राम पर रनिंग कम्युनिटी को देखें, तो हर कोई खुश, ऊर्जावान और प्रेरित नज़र आता है। सुबह की सुनहरी धूप, नए कार्बन-प्लेटेड रनिंग शूज, और 15 किलोमीटर दौड़ने के बाद भी चेहरे पर एक परफेक्ट मुस्कान। यह पूरी तस्वीर का सिर्फ 10 प्रतिशत है। असली सच्चाई तब सामने आती है जब लगातार कई हफ्तों की ट्रेनिंग के बाद, सुबह 4:30 बजे अलार्म बजता है और आपके मुंह से पहली आवाज़ गालियों की निकलती है। जब अपने ही जूतों से नफरत होने लगे और दौड़ना 9-से-5 की उस नौकरी जैसा लगने लगे जिससे आप चिढ़ते हैं, तो समझ लीजिए कि कुछ गलत है। यह महज़ पैरों की थकान नहीं है। यह मानसिक बर्नआउट है। धावक अक्सर शारीरिक दर्द को तवज्जो देते हैं, लेकिन दिमाग के थकने को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। Runner's World के एक बेहतरीन लेख में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि रनिंग बर्नआउट के मनोवैज्ञानिक संकेत उतने ही वास्तविक होते हैं जितने कि शारीरिक संकेत। इनसे बाहर निकलने के लिए अपनी प्रेरणा को फिर से जगाने की सख्त ज़रूरत होती है। जब हर लॉन्ग रन एक सज़ा लगने लगे, तो यह कमज़ोरी नहीं, बल्कि एक चेतावनी है।रविवार की सुबह: लॉन्ग रन बनाम पुरानी हिंदी फिल्में
अगर आप एक सख्त marathon training plan फॉलो कर रहे हैं, तो रविवार का मतलब होता है लॉन्ग रन। 20 से 25 किलोमीटर की लंबी और थका देने वाली दौड़। पिछले रविवार को मेरा भी यही प्लान था। लेकिन शनिवार को पहाड़ों में एक चुनौतीपूर्ण ट्रेकिंग के बाद, मेरा शरीर और दिमाग दोनों शटडाउन मोड में जा चुके थे। सुबह अलार्म बजा। मैंने उसे बंद किया और सोफे पर गिर पड़ा। जूतों को छुआ तक नहीं। इसके बजाय, 1971 की क्लासिक फिल्म 'आनंद' लगा ली। हृषिकेश मुखर्जी का निर्देशन, और राजेश खन्ना के भावपूर्ण एक्सप्रेशन। बिना किसी भारी वीएफएक्स के, सिर्फ एक मजबूत कहानी के दम पर कैसा जादुई सिनेमा बनता था! "बाबू मोशाय, जिंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं..." यह डायलॉग सुनते हुए जो मानसिक शांति मिली, वह शायद 25 किलोमीटर की दौड़ में कभी नहीं मिलती। मैं करीब तीन घंटे तक उसी पुरानी दुनिया में खोया रहा। दौड़ने के बारे में एक बार भी नहीं सोचा। देखिए, विषय से भटकना लाज़मी है जब दिमाग को ब्रेक चाहिए होता है। मुझे यह स्वीकार करने में कोई शर्म नहीं है कि उस दिन मैंने अपना रन स्किप किया। इस आराम ने अगले हफ्ते की ट्रेनिंग को और बेहतर बना दिया। Hal Higdon, जो कि मैराथन ट्रेनिंग के सम्मानित गुरुओं में से एक हैं, हमेशा निर्धारित रेस्ट डेज़ और क्रॉस-ट्रेनिंग के महत्व पर ज़ोर देते हैं। मानसिक और शारीरिक थकान से बचने का यही एकमात्र तरीका है।बर्नआउट से बाहर निकलने के अचूक उपाय
बर्नआउट के अंधेरे कुएं से बाहर आने के लिए मोटिवेशनल कोट्स काम नहीं आते। ठोस और व्यावहारिक कदम उठाने पड़ते हैं। स्पोर्ट्स साइकोलॉजी और कम्युनिटी डेटा के आधार पर, यह समस्या कुछ आसान बदलावों से हल की जा सकती है:रूट में बदलाव
रोज़ाना उसी एक पार्क या सड़क पर चक्कर लगाना किसी को भी पागल कर सकता है। रूटीन में बदलाव ज़रूरी है। शहर के दूसरे हिस्से में जाना या किसी नई ट्रेल पर दौड़ना मददगार साबित होता है। Strava Year in Sport डेटा दर्शाता है कि जो धावक अपने रनिंग रूट्स बदलते रहते हैं, उनका ट्रेनिंग के प्रति लंबे समय तक उत्साह बना रहता है।कम्युनिटी की ताकत
अकेले दौड़ना एकाकी अनुभव हो सकता है।- स्थानीय रनिंग ग्रुप्स से जुड़ना।
- पेस (Pace) की चिंता छोड़कर सिर्फ बातचीत करने के लिए ग्रुप रन में जाना।
- नए धावकों का मार्गदर्शन करना।
सुझाव: अगर दौड़ना बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा है, तो 3-4 दिनों के लिए जूते अलमारी में बंद कर दें। इसकी जगह साइकलिंग करें, स्विमिंग करें, या सिर्फ स्ट्रेंथ ट्रेनिंग पर ध्यान दें। क्रॉस-ट्रेनिंग से कार्डियो बेस बना रहता है और दिमाग को छुट्टी मिल जाती है।

मेरे 8 सालों का सफर: ओव्हरट्रेनिंग का प्रभाव
2015 में जब मेरी मैराथन ट्रेनिंग की शुरुआत हुई थी, तब मुझमें एक अजीब सा जुनून था। मैं हर दिन दौड़ना चाहता था। लेकिन 2018 आते-आते, यह ज़िद भारी पड़ने लगी। दिल्ली-एनसीआर की सर्दियों का समय था। स्मॉग अपने चरम पर था, लेकिन मैं अपने marathon training plan को लेकर इतना जुनूनी था कि मैंने रिकवरी को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया। इसी दौरान मैं ओव्हरट्रेनिंग सिंड्रोम (OTS) का शिकार हुआ। 14 नवंबर 2018 का वह दिन मुझे आज भी याद है। मेरी रेस्टिंग हार्ट रेट (RHR) आमतौर पर 48 bpm रहती थी। उस सुबह जब मैंने अपनी गार्मिन वॉच देखी, तो वह 62 bpm दिखा रही थी। मुझे लगा शायद वॉच खराब है। उंगलियों को अपनी गर्दन पर रखा और दीवार घड़ी की ओर देखते हुए पूरे 60 सेकंड तक मैन्युअल रूप से अपनी पल्स गिनी। (डेटा को लेकर मेरा थोड़ा जुनूनी होना स्वाभाविक है, क्योंकि 15 सेकंड गिनकर 4 से गुणा करने वाला तरीका एरिथमिया होने पर सटीक नहीं बैठता)। पल्स सच में 62 थी। मैंने तुरंत अपनी एक्सेल स्प्रेडशीट खोली जिसमें मैं अपना दैनिक डेटा ट्रैक करता था। कमरे का तापमान (18°C) भी दर्ज किया। शरीर भारी लग रहा था, मैं चिड़चिड़ा हो गया था और नींद उड़ चुकी थी। PubMed Central के वैज्ञानिक शोध स्पष्ट रूप से बताते हैं कि एंड्योरेंस एथलीट्स में OTS का निदान करने के लिए ये क्लासिक क्लिनिकल लक्षण हैं। उस अनुभव ने मुझे तोड़कर रख दिया था। लेकिन उसी ने मुझे एक बेहतर धावक और एक प्रमाणित कोच बनाया। 8 साल के अनुभव के बाद अब मैं जानता हूं कि रिकवरी कोई लग्ज़री नहीं है।आंकड़ों की नज़र में धावकों की मानसिक थकान
व्यक्तिगत कहानियों से परे, केवल आंकड़ों पर नज़र डालें तो स्थिति काफी स्पष्ट हो जाती है। ट्रेनिंग बीच में ही छोड़ देने (ड्रॉप-ऑफ रेट्स) का सीधा संबंध मानसिक थकान से है। RunRepeat द्वारा प्रकाशित सांख्यिकी इस बात पर प्रकाश डालती है कि कैसे मानसिक तनाव और बर्नआउट लॉन्ग-डिस्टेंस रनिंग में बड़ी भूमिका निभाते हैं। रिसर्च डेटा के अनुसार, जो एथलीट्स बिना किसी संरचित आराम के लगातार उच्च तीव्रता वाली ट्रेनिंग करते हैं, उनमें इंजरी और मानसिक थकान के कारण ट्रेनिंग छोड़ने की संभावना बढ़ जाती है।| ट्रेनिंग का प्रकार | साप्ताहिक माइलेज (औसत) | रिकवरी दिन/सप्ताह | बर्नआउट ड्रॉप-ऑफ रेट (%) |
|---|---|---|---|
| अत्यधिक तीव्र (Aggressive) | 80+ किमी | 0-1 | 34% |
| मध्यम (Moderate) | 50-70 किमी | 2 | 18% |
| लचीला (Flexible/Cross-training) | 40-60 किमी | 3 (सक्रिय रिकवरी सहित) | केवल 9% |
| Source: RunRepeat Analysis. Last verified: 2023-12-12 | |||
ध्यान दें: आंकड़े साबित करते हैं कि एक लचीला ट्रेनिंग प्लान, जिसमें रिकवरी को महत्व दिया जाता है, लंबे समय तक धावक को स्वस्थ रखता है।
Comments
Comments are currently closed. Have feedback or a question? Visit the Contact page.